मन के भावों को बाह जाने दो। न कोई सीमा रह जाने दो। देखो न बचा रहे कोई अवसाद। दूर हो जन - जीवन का विषाद।
गुरुवार, 9 जुलाई 2020
गुरुवार, 2 जुलाई 2020
संभावनाओं की खोज
३० वर्ष पहले की बात है। एक वृद्ध, जो केवल उम्र से ६५ वर्ष के थे; एक बालक को ३० किलोमीटर साइकिल पर बिठा कर ले आये। उम्र भले ६५ रही हो पर उनका हौसला और आत्मविश्वास ३५ वाला था और बालक के लिए मन में प्रेम अपार था। हो भी क्यों न, बालक उनका अपना खून जो था। नाती वैसे भी बेटे से ज्यादा प्यारा होता है। मित्रों यह किसी और की नहीं मेरी स्वयं की कहानी है।
आज ३००० किलोमीटर का हवाई सफर करने के बाद भी वह आनंद नहीं आता, जो दादा जी के साथ साइकिल पर बैठ कर आता था। उसमे एक अपना ममत्व था, लगाव था। फ्रंट सीट के आभाव में कपड़े की सीट बना के काम चला लिया जाता था। पर वह स्वाभिमान युक्त सवारी थी। क्यूंकि कर्ज से मुक्त थी।
आज हमें किसी भी चीज की आवश्यकता होती है तो हम फट से अमेज़न, फ्लिपकार्ट, स्नैपडील पर चले जाते हैं। आव देखते हैं न ताव emi पर उपलब्ध पसंद आने वाली कोई भी चीज उठा लेते हैं और १५-२० दिन बाद उन्ही चीजों से विमुख होने लगते हैं। कारण मात्रा इतना है की आज हम आवश्यकता पर नहीं बल्कि अपनी इच्छाओं और महत्त्वकांछाओं पर बल देते हैं। हमारा सेंस ऑफ़ अचीवमेंट भौतिक पदार्थों में ही विलुप्त होता जा रहा है। जबकि हमारे पहले की पीढ़ीओं ने अच्छे खाने, सादा जीवन जीने और सर्वांगीण विकास पे अधिक जोर दिया और तभी वे पाई पाई जोड़ कर नूतन स्वतंत्र हुए भारत के विकास में योगदान दे पाए। आज जो कम्पाउंडिंग इंटरेस्ट का फंडा ले के बैंक, इन्शुरन्स कंपनियां, म्यूच्यूअल फण्ड हाउसेस गली गली घूम रहे हैं, वह भारतीय संस्कृति में पहले से मौजूद था। इसी लिए कमोबेश हर भाषा - भाशी संस्कृति में रुपये में से कम से कम २५ पैसे बचने पे जोर दिया करते थे।
लॉक डाउन और चीन से युद्ध के गहराते घने बादलों के बीच, तथा घटती आर्थिक संभावनाओं में यथासंभव बचत और जीवन उपयोगी वस्तुओं पर ही व्यय बचे हुए विकल्प हैं। हमारे प्रसिद्ध अर्थविद चाणक्य जी ने कहा है की संकट के समय ही बंधू-बांधवों, मित्रों की परीक्षा होती है। इसके आगे वे यही भी कहते हैं की प्रायः अच्छे दिनों में मित्रों से घिरा व्यक्ति विपन्नता के दौर में मित्रों तथा बधु-बांधवों से भी विपन्न हो जाता है। अतः उक्त काल में स्वावलम्बन, अर्थ संग्रह एवं संभावनाओं की निरन्तर तलाश ही एकमात्र सम्पन्नता का मार्ग है।
भारत के इतिहास में यह कोई पहली बार नहीं हो रहा की हम ऐसे मुश्किल के दौर से गुजर रहे हैं। अनेकों बार आक्रांताओं ने हमारे धन और भूमि को विनष्ट किया है। पर नष्ट करने से ज्यादा बड़ा हमेशा सर्जन करने वाला होता है। और हमारी सर्जनात्मकता को हमसे कोई नहीं छीन सकता। बस हमें अपने आप को और अपनी संस्कृति को पहचानना होगा। सर्जनात्मकता वैसे भी किसी का अनुकरण नहीं बल्कि सर्वथा मौलिक होती है।
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