मंगलवार, 5 मई 2020

लड़ना है जमकर, डट जाओ कमर कसकर




"दोनों शत्रुओं से लड़ना है जमकर, मैदान में डट जाओ कमर कसकर।" जी हाँ, स्थिति बिलकुल यही है। भारत में पिछले ४० दिनों से लॉक डाउन चल रहा है। अख़बार आर्थिक और सामाजिक आकलन के रिपोर्टों से पट गए हैं। अनुमानतः ऐसा बताया जा रहा है कि मार्च, अप्रैल एवं मई के लॉक डाउन से भारतीय जीडीपी पे लगभग २०% से ३०% तक का असर हो सकता है। 

 मशहूर उद्योगपति श्री रतन टाटा जी ने सारगर्भित शब्दों में ट्वीट कर के लिख दिया है कि "मेरे प्यारे व्यवसाई भाइयों २०२१ कमाने का नहीं जान बचाने का वर्ष है। जान बचाना भी कामना ही है।"
जीवन रक्षण और जीविकोपार्जन दोनों के संकट को भली भांति समझते हुए राज्य एवं केंद्र सरकार ने आपसी सामंजस्य बिठाते हुए मजदूरों एवं छात्रों को उनके घर पहुँचाने का मार्ग प्रशश्त किया है जो सराहनीय है। हाला की इन सभी को १४ से २१ दिनों की अवधि के लिए क्वारंटाइन में जाना पड़ेगा, पर उसके सामने परिजनों को जो निश्चिंतता प्राप्त हो रही है वह अतुलनीय है। 

आईटी जगत के प्रसिद्ध उद्योगपति श्री नारायण मूर्ती ने चिंता जताते हुए व्यक्त किया है कि,"  यदि  लॉक डाउन के कारण इसी तरह सारी गतिविधियाँ ऐसे ही स्थगित रहीं तो निश्चित तौर पे भूख से मरने वालों की संख्या कोरोना से मरने वालों की संख्या से ज्यादा होगी।"

यदि भारत के जनसंख्या के समीकरण निकाल के देखे जाएँ, तो उपरोक्त बात कत्तई गलत नहीं लगती। देश के लगभा १३० करोड़ जनसँख्या में से ४५  करोड़ शहरों में रहती है और बाकि ८५ करोड़ आज भी गावों में रहती है। इन ४५ करोड़ लोगों में से ४० करोड़ लोग ऐसी नौकरियों में हैं जिनकी आय १०००० प्रति माह से कम है। ऐसी स्थिति में परिवार को लेकर बड़े बड़े शहरों में रहना अत्यंत कठिन और दुखदाई है। ३५ करोड़, दिहाड़ी या मजदूरी पर काम करने वालों के लिए जहाँ स्थितियाँ सोचनीय हैं, वहीँ निम्न मध्यम  और मध्यम वर्ग की स्थिति भी कोई खास अच्छी नहीं है। यदि यह लॉक डाउन १-२ महीने और चल गया तो संकट इतना गहरा जायेगा की लोगों को अतैव मेहनत से प्राप्त किया और संजोया धन भी जाता रहेगा। 

विपन्नता जहाँ कुपोषण को आमंत्रण देती है, वहीँ कुपोषण बीमारी को।२०१९ की ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 30.3 के स्कोर के साथ भारत भुखमरी की गंभीर श्रेणी से गुजर रहा है। 117 देशों की इस सूची में भारत 102वें स्थान पर है। GHI रिपोर्ट के अनुसार, भारत का चाइल्ड वेस्टिंग रेट 20.8 फीसदी है, जो बेहद ऊंचा है। इस इंडेक्स को चार पैमानों पर आकलित किया गया है - कम पोषण, चाइल्ड वेस्टिंग (पांच साल से कम उम्र के बच्चे, जिनका वज़न उम्र के लिहाज़ से कम है), चाइल्ड स्टंटिंग (पांच साल से कम उम्र के बच्चे, जिनकी ऊंचाई उम्र के लिहाज़ से कम है) और पांच साल से कम आयु में शिशु मृत्यु दर। यूनीसेफ (UNICEF)“State of the World’s Children 2019” रिपोर्ट के अनुसार सं २०१८ में ५ वर्ष से नीचे  की आयु के मरने वालों की संख्या ८८२००० थी।  यह किसी भी देश के लिया बहुत ज्यादा है। 

 प्रस्तुत चुनौतियों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि, भारतीय सरकारों ने आपसी सामंजस्य और संघीय तथा केंद्रीय व्यस्थाओं का जो अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है वह प्रशंसनीय है। यही नहीं खतरे को उचित समय पर भांप कर, एक सुनियोजित तौर पर दल-बद्ध तरीके से जो विविध निर्णय लये गए एवं उनका क्रियान्वन हुआ वह अनुपम है।  हाला की जो भारतीय व्यवस्था की कमजोरी रही है - "योजनाओं का लाभ लाभार्थियों की आखरी श्रेणी तक पहुंचे इसकी जांच और समीक्षा निरंतर होते रहना चाहिए" अन्यथा कागजी योजनाएं केवल पढ़ने के काम आती हैं, अन्य किसी को लाभ प्राप्त नहीं होता। 

इधर वैश्विक तौर पर अमरीका और जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटैन जैसे कई यूरोपीय देशों तथा जापान, दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों ने चीन की आर्थिक रणनीति को समझते हुए उससे विलग होने का फैसला लिया है।  केंद्र सरकार  और राज्य सरकारें विभिन्न कंपनियों को निमंत्रण देने के लिए आतुर हैं। उचित समय पर उठाये गए ऐसे सार्थक कदम सच में भारत के भविष्य को सुदृढ़ और संपन्न बनाएंगे।







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