बुधवार, 29 अप्रैल 2020

भक्ति सागर की सुर सरिता के दो गुंजायमान सुर: रविंद्र जैन और महेंद्र कपूर


भारतीय जीवन पद्धति में नव रस , नव निधि, अष्ट सिद्धियों की बात कही गयी है।  इन सभी में कहीं न कहीं भक्ति और संगीत का जिक्र है। संगीत को वैसे ही मनमोहक माना जाता रहा है और यह प्रकृति के सुरम्य उपहारों में से एक है। यदि ध्यान दिया जाए तो पाएंगे कि देवताओं का एक नाम सुर है, इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि शब्दों की कर्णप्रियता, मनमोहकता, छंद और व्याकरण भाषा की अलौकिकता की पराकाष्ठा के उस प्रतिमान तक पहुंचाते हैं कि साधन और साध्य का भेद ही मिट जाता है। वहीँ दूसरी ओर कर्कशता, लयहीनता, व्याकरण जनित त्रुटि संस्कारहीनता का परचायक तो है ही, साथ ही साथ उसकी पराकाष्ठा आसुरी प्रवृत्तिओं का द्योतक भी है।

ऐसा कहा जाता है की माहेश्वर सूत्र का प्रतिपादन स्वयं भगवन शिव ने किया था। इसी प्रकार अधिकतर देवी देवताओं को किसी न किसी कला से जोड़ा जाता रहा है जो उनकी संवेदनशीलता , सौम्यता एवं मानवीय पक्षों का परिचायक है। कृष्ण भगवान् को बंसी और नृत्य से जोड़कर देखा जाता रहा है तो शिव को डमरू बजाने से।  दोनों के नाम नटवर और नटराज भी हैं।  इसी प्रकार माता सरस्वती , महर्षी  नारद , कपिवर श्री हनुमान जी को वीणा की साधना करते बताया जाता है। ऐसे ही रावण को भी वीणा का बहुत ही उत्तम ज्ञान था और उसके वीणा वादन से शिवजी प्रसन्न हुए थे। 

भक्ति का और संगीत का नाता बड़ा ही पुराना है।  और ऐसा भी नहीं है की यह नाता केवल सनातन धर्म में है।  यह एक सामान्य मान्यता है और अनुभवों से यह सिद्ध भी हुआ है कि ईश्वर की भक्ति और उसके समर्पण में की गई चीजें हमेशा पारलौकिक हो जाती हैं।  हाँ यह बात और है की यह जादू  समर्पण , निष्ठा,  इन सब की सम्मिलित दृढ़ता का भी हो सकता है। इसी लिए सभी धर्मों में भक्ति की भाषा काव्य, भजन , संगीत आदि है। 

भारतीय सिनेमा जगत, चाहे वह छोटा पर्दा हो या बड़ा दोनों से संगीत का बड़ा पुराना नाता रहा है। भक्ति संगीत भी इससे इतर नहीं है। भारतीय सिनेमा में भक्ति की धारा, सिनेमा की शुरुआत से ही बहती रही है और इसके बहाव में नैरंतर्य आज भी विद्यमान है। संगीतकारों  के प्रयासों और प्रतिभा वैविध्य ने भक्ति संगीत को एक अलग विधा के रूप में भी स्थापित किया। भक्ति संगीत के कुछ जाने मने नाम हैं लता मंगेशकर , रविंद्र जैन , महेंद्र कपूर , गुलशन कुमार , अनुराधा पौडवाल , अनूप जलोटा, मोहम्मद रफ़ी , पंडित जसराज, उदित नारायण आदि। इनमे से रविंद्र जैन और महेंद्र कपूर का नाम विशेष विस्मर्णीय है।

‘रामायण’, ‘श्रीकृष्णा’, ‘लवकुश’, ‘जय माँ दुर्गा’, ‘साई बाबा’ जैसे मशहूर धारावाहिकों  में रवींद्र जैन ने अपने संगीत से प्राण फूंक दिए थे। एक ऐसा भी समय आया जब वे भक्ति संगीत का पर्याय हो चले। यहाँ तक कि कुछ लोग तो उन्हें उनकी कृष्ण भक्ति के कारण आधुनिक काल का सूरदास भी कहने लगे। उनके कुछ प्रसिद्द गीत हैं - (गीत गाता चल-1975), ले जाएंगे, ले जाएंगे, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (चोर मचाए शोर-1973), एक राधा एक मीरा (राम तेरी गंगा मैली-1985), अंखियों के झरोखों से, मैंने जो देखा सांवरे (अंखियों के झरोखों से-1978), श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम (गीत गाता चल-1975) आदि। सन् १९८५ में उन्हें फ़िल्म राम तेरी गंगा मैली के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष २०१५ में उनको पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 

महेन्द्र कपूर हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध पार्श्वगायक थे। उन्होंने बी आर चोपड़ा की फिल्मों हमराज़, ग़ुमराह, धूल का फूल, वक़्त, धुंध में विशेष रूप से यादगार गाने गाए। संगीतकार रवि ने इनमें से अधिकाश फ़िल्मों में संगीत दिया। बदल जाए अगर माली, चमन होता नही खाली, चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाए हम दोनो, हैं प्रीत जहा की रीत सदा, मैं गीत वहा के गाता हू, मेरे देश की धरती सोन उगले, उगले हिरे मोती, ना मुँह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो, नील गगन के तले, धरती का प्यार पले  आदि उनके कुछ सु प्रसिद्द गाने हैं। महेंद्र कपूर ने वैसे तो सैकड़ों भजन गाये हैं पर बी आर चोपड़ा के धारावाहिक महाभारत का टाइटल गीत गा कर उन्होंने अपनी छवि को और पुख्ता किया। 1963 - चलो इक बार फ़िर से (ग़ुमराह), 1967 - नीले गगन के तले (हमराज़), 1974 - नहीं नहीं (रोटी कपड़ा और मकान) के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 

भक्ति संगीत में इन दोनों दिग्गजों का योगदान विस्मर्णीय है।





मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

5S: Sorting

आयुर्वेद के खजाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता का वरदान




भारतीय चिकित्सा विज्ञान 5000 से अधिक साल पहले बहुत समृद्ध था और इसका निशान था। 3500 साल पहले सर्जिकल साइंस सहित विभिन्न प्रकार की बीमारियों के लिए आयुर्वेद की विशिष्ट विशिष्टताएँ थीं। वराह मिहिर, चरक, सुश्रुत, निघंट आदि कुछ प्राचीन भारत के प्रसिद्ध चिकित्सक हैं।

आयुर्वेद तीन मूलभूत ऊर्जाओं (दोहों) की अवधारणा पर आधारित है जो एक व्यक्ति के आंतरिक और बाहरी वातावरण को नियंत्रित करती है, जिसे संस्कृत में वात (पवन), पित्त (अग्नि), और कपा (पृथ्वी) के रूप में जाना जाता है। ये प्राथमिक बल किसी व्यक्ति के मन और शरीर की विशेषताओं की जड़ हैं, और जिस तरह से वे किसी भी तरह की बीमारी या एंटीबॉडी का जवाब देते हैं।

दोषों के असंतुलन को प्रतिरक्षा के कमजोर होने, या बीमारी का कारण बनने के लिए जाना जाता है। जब कम से कम तनाव होता है और किसी व्यक्ति के भीतर ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होता है, तो शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली मजबूत होती है और यह आसानी से बीमारी से बचाव कर सकती है या किसी भी तरह की बीमारी से उबर सकती है।

 1. अश्वगंधा

अश्वगंधा (विथानिया सोम्निफेरा) भारत और उत्तरी अफ्रीका का एक छोटा लकड़ी का पौधा है। इसे एक एडाप्टोजेन माना जाता है, जिसका अर्थ है कि यह आपके शरीर को तनाव को अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में मदद करता है। अनुसंधान से पता चला है कि यह कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है, एक हार्मोन जो तनाव और चिंता विकारों वाले लोगों में तनाव के निचले स्तर और बेहतर नींद के तनाव के जवाब में आपकी अधिवृक्क ग्रंथियों का उत्पादन करता है। इसके अलावा, अनुसंधान से पता चला है कि अश्वगंधा मांसपेशियों की वृद्धि, स्मृति और पुरुष प्रजनन क्षमता, साथ ही निम्न रक्त शर्करा के स्तर को बढ़ा सकता है।


2. त्रिफला

त्रिफला में आंवला, बहेरा, हरितकी सम्मिलित हैं। यह एक प्राकृतिक रेचक के रूप में काम 
करता है,पेट की बीमारियों के साथ लोगों में आंत्र आंदोलनों की आवृत्ति और स्थिरता में सुधार
करते हुए कब्ज, पेट दर्द और पेट फूलना कम करता है।
  
 3. ब्राह्मी

ब्राह्मी आयुर्वेदिक चिकित्सा में एक प्रधान जड़ी बूटी है और इसमें मजबूत रोग प्रतिकारक गुण हैं। यह सीखने की दर, ध्यान, स्मृति में सुधार के साथ-साथ ध्यान घटने की सक्रियता विकार (एडीएचडी) के लक्षणों को कम करता है, जैसे कि असावधानी, आवेग, खराब आत्म-नियंत्रण और बेचैनी में आराम होता है। कुछ अध्ध्यनों के अनुसार ब्राह्मी तनाव और चिंता से निपटने के लिए शरीर की क्षमता में सुधार करने में भी मदद कर सकती है।

4. जीरा (जीरा)

अनुसंधान से पता चलता है कि जीरा पाचन एंजाइमों की गतिविधि को बढ़ावा देता है और जिगर से पित्त की रिहाई, पाचन में तेजी लाने और वसा के पाचन को आसान बनाने में मदद करता है। यह पेट में दर्द और  सूजन जैसे चिड़चिड़ा आंत्र सिंड्रोम (IBS) के लक्षणों को भी कम करता है। जीरा भी रक्त शर्करा के स्तर को कम करके और इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करके टाइप 2 मधुमेह से बचा सकता है। यह ट्राइग्लिसराइड्स  और एलडीएल (खराब) कोलेस्ट्रॉल को कम करते हुए एचडीएल (अच्छा) कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाकर हृदय रोग से भी बचा सकता है।
 
 5. हल्दी

हल्दी आयुर्वेदिक मसाला है जो करी को अपने पीले रंग में रंग देता है। इसका मुख्य यौगिक, सूजन को कम करने और दिल और मस्तिष्क के स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद करता है। इसके दर्द को हर लेने और चोटों पर सरसों के तेल के साथ गर्म कर के लेप करने से एंटीसेप्टिक के रूप में काम करने से सदियों से इसका प्रयोग होता रहा है।

 6. इलायची
 इलायची एक आयुर्वेदिक मसाला है जो रक्तचाप को कम कर सकता है, साँस लेने में सुधार कर सकता है और संभावित रूप से पेट के अल्सर को ठीक करने में मदद कर सकता है। इलायची के आवश्यक तेल को सूंघने से व्यायाम के दौरान फेफड़ों में ऑक्सीजन का प्रवाह बढ़ सकता है।

  7. अदरक

अदरक, जिसे संस्कृत में अद्रक या शुनती के रूप में जाना जाता है, आयुर्वेद में विश्व-आयुध
के रूप में भी जाना जाता है। यह रसायण कई विकारों का इलाज है और इसलिए आयुर्वेद में 
सबसे अच्छा प्रतिरक्षा बूस्टर है। खाने से पहले एक चुटकी सेंधा नमक के साथ अदरक का एक 
इंच लंबा टुकड़ा भूख को उत्तेजित करने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है । इसका
शक्तिशाली संयोजन मतली के लिए एक ज्ञात और प्रभावी मारक है।


 8. तुलसी 

तुलसी, एक सुगंधित बारहमासी पौधा है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का मूल निवासी है और पूरे दक्षिण पूर्व एशियाई उष्णकटिबंधीय में एक खेती के पौधे के रूप में व्यापक है। यह खांसी और ठंड की बीमारियों के लिए एक महान उपाय माना जाता है और यह प्रतिरक्षा का एक सामान्य बूस्टर है।


यदि ये जड़ी-बूटियाँ उपलब्ध नहीं हैं, तो आप सीधे तौर पर कुछ अच्छी कंपनी जैसे डाबर, बैद्यनाथ, झंडू, पतंजलि आदि से अश्वगंधा चूर्ण (पाउडर), त्रिफला चूर्ण, तुलसी अर्क, च्यवनप्राश आदि ले सकते हैं। अब भारतीय स्वास्थ्य विभाग भी कोरोना के खिलाफ लड़ने के लिए इन जड़ी बूटियों और प्रतिरक्षा बूस्टर के लिए सलाह दे रहा है।





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