गुरुवार, 2 जुलाई 2020

संभावनाओं की खोज

३० वर्ष पहले की बात है। एक वृद्ध, जो केवल उम्र से ६५ वर्ष के थे; एक बालक को ३० किलोमीटर साइकिल पर बिठा कर ले आये। उम्र भले ६५ रही हो पर उनका हौसला और आत्मविश्वास ३५ वाला था और बालक के लिए मन में प्रेम अपार था। हो भी क्यों न, बालक उनका अपना खून जो था।  नाती वैसे भी बेटे से ज्यादा प्यारा होता है। मित्रों यह किसी और की नहीं मेरी स्वयं की कहानी है। 
आज ३००० किलोमीटर का हवाई सफर करने के बाद भी वह आनंद नहीं आता, जो दादा जी के साथ साइकिल पर बैठ कर आता था।  उसमे एक अपना ममत्व था, लगाव था। फ्रंट सीट के आभाव में कपड़े की सीट बना के काम चला लिया जाता था। पर वह स्वाभिमान युक्त सवारी थी। क्यूंकि कर्ज से मुक्त थी। 
आज हमें किसी भी चीज की आवश्यकता होती है तो हम फट से अमेज़न, फ्लिपकार्ट, स्नैपडील पर चले जाते हैं। आव देखते हैं न ताव emi पर उपलब्ध पसंद आने वाली कोई भी चीज उठा लेते हैं और १५-२० दिन बाद उन्ही चीजों से विमुख होने लगते हैं। कारण मात्रा इतना है की आज हम आवश्यकता पर नहीं बल्कि अपनी इच्छाओं और महत्त्वकांछाओं पर बल देते हैं। हमारा सेंस ऑफ़ अचीवमेंट भौतिक पदार्थों में ही विलुप्त होता जा रहा है।  जबकि हमारे पहले की पीढ़ीओं ने अच्छे खाने, सादा जीवन जीने और सर्वांगीण विकास पे अधिक जोर दिया और तभी वे पाई पाई जोड़ कर नूतन स्वतंत्र हुए भारत के विकास में योगदान दे पाए।  आज जो कम्पाउंडिंग  इंटरेस्ट का फंडा ले के बैंक, इन्शुरन्स कंपनियां, म्यूच्यूअल फण्ड हाउसेस गली गली घूम रहे हैं, वह भारतीय संस्कृति में पहले से मौजूद था। इसी लिए कमोबेश हर भाषा - भाशी संस्कृति में रुपये में से कम से कम २५ पैसे बचने पे जोर दिया करते थे। 
लॉक डाउन और चीन से युद्ध के गहराते घने बादलों के बीच, तथा घटती आर्थिक संभावनाओं में यथासंभव बचत और जीवन उपयोगी वस्तुओं पर ही व्यय बचे हुए विकल्प हैं। हमारे प्रसिद्ध अर्थविद चाणक्य जी ने कहा है की संकट के समय ही बंधू-बांधवों, मित्रों  की परीक्षा होती है। इसके आगे वे यही भी कहते हैं की प्रायः अच्छे दिनों में मित्रों से घिरा व्यक्ति विपन्नता के दौर में मित्रों तथा बधु-बांधवों से भी विपन्न हो जाता है। अतः उक्त काल में स्वावलम्बन, अर्थ संग्रह एवं संभावनाओं की निरन्तर तलाश ही एकमात्र सम्पन्नता का मार्ग है। 
भारत के इतिहास में यह कोई पहली बार नहीं हो रहा की हम ऐसे मुश्किल के दौर से गुजर रहे हैं। अनेकों बार आक्रांताओं ने हमारे धन और भूमि को विनष्ट किया है। पर नष्ट करने से ज्यादा बड़ा हमेशा सर्जन करने वाला होता है। और हमारी सर्जनात्मकता को हमसे कोई नहीं छीन सकता। बस हमें अपने आप को और अपनी संस्कृति को पहचानना होगा। सर्जनात्मकता वैसे भी किसी का अनुकरण नहीं बल्कि सर्वथा मौलिक होती है। 


मंगलवार, 26 मई 2020

आधुनिक शिक्षा प्रणाली


प्रिय मित्रों!

क्या आपने सोचा है कि हमने लगभग 15 से 17 वर्षों तक क्यों अध्ययन किया या सीखा? कभी-कभी 20-25 से अधिक वर्षों के लिए, जिन्होंने कुछ शोध किया है, पीएचडी किया है या डबल पोस्ट ग्रेजुएट हैं। मैं उन सभी लोगों के धैर्य को सलाम करता हूँ। वास्तव में अध्ययन में इतनी लंबी रुचि रखने वालों को दोहरी सलामी।

जब आप लापरवाही करते थे, तब क्या आप अपने माता-पिता के चिल्लाने / शब्दों को याद करते हैं?  या जब  भविष्य के लिए मीठी सलाह देते थे? उनमें से अधिकांश ने सिर्फ एक बात की ओर इशारा किया - यदि आप अध्ययन करते हैं तो आपको अच्छी नौकरी मिलेगी, सभी भौतिक इच्छाएं और विलासिताएं मिलेंगी और यह  जीवन दुखी नहीं होगा।  और विपरीत करने पर आप एक बड़े पराजित या भिखारी होंगे। यह वह तथ्य नहीं है जो उन्होंने खुद सीखा है। इस तथ्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पढ़ाया और हस्तांतरित किया गया है।

अंग्रेजों के साम्राज्य में हम पूरी तरह से ब्रिटिश अधिकारियों या स्थानीय राजाओं की दया पर निर्भर थे। मुगल / मुस्लिम शासकों के साथ ब्रिटिशों की सीधी और सबसे बड़ी प्रतियोगिता थी, इसलिए उन्होंने ब्राह्मणों और कायस्थों का पक्ष लेना शुरू कर दिया क्योंकि वे बहुत अच्छे सीखने वाले थे। कायस्थ (श्रीवास्तव, खेर, खन्ना, सिन्हा आदि) अंग्रेजों के अधिक निकट थे क्योंकि वे अपने पीने और खाने की आदतों के कारण अच्छी तरह से उनमे घुल-मिल सकते थे जो ब्राह्मण नहीं कर सकते थे। 1857 के बाद (मंगल पांडे की घटना) के बाद उन्होंने महसूस किया कि ब्राहमणों को बहुत पास रखना मुश्किल होगा क्योंकि उनकी अपनी बुद्धिमत्ता है और यह बैकफायर भी हो सकता है।

अगर हम भारत की वास्तविक / मूल शिक्षा प्रणाली को समझने की कोशिश करते हैं, तो यह एक ऐसी प्रणाली थी जो मूल शिक्षा पर लोगों को जागरूक करने और फिर विभिन्न विधाओं में विशेषज्ञता प्रदान करने पर निर्भर थी और हर किसी के लिए नौकरी की सुरक्षा थी। गांधी जी ने बताया था कि, "धरती पर हर किसी की ज़रूरत के लिए पर्याप्त है, लेकिन सभी संसाधन मिल कर भी किसी एक व्यक्ति  के लालच को भी पूरा नहीं कर पाएंगे"।

मूल शिक्षा प्रणाली ने व्यक्ति के हित पर ध्यान केंद्रित किया और सभी व्यवसायों को महिमामंडित किया। प्रतिभा को हमेशा भारतीयों द्वारा अनमोल माना जाता रहा है। प्रतिभाशाली होने की उच्चतम कीमत केवल उन समुदायों द्वारा अदा की गई है जो सबसे प्रतिभाशाली थे जैसे हिंदू, माया और यहूदी। 

आम तौर पर किसी विशेष उत्पाद या सेवा की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को देखकर, परिवार द्वारा पोषित होने वाले बच्चों का ध्यान स्वतः आकर्षित होता रहता था और इस तरह वे एक प्रशिक्षु के रूप में जुड़ते थे और उस्ताद बनकर सामने आते थे।

किसी कौशल को प्रदत्त करने का मूल सिद्धांत, उस कौशल का उपयोग (इरादा और सामग्री दोनों) को समझने और समझने की योग्यता का आकलन करने के बाद इसे प्रदत्त करना या सिखाना था। आज की शिक्षा प्रणाली में यह लुप्त हो गया है। एक तरह से आकांक्षा की दौड़ में हम अपनी प्राकृतिक (पैतृक) प्रतिभा को खो रहे हैं और दूसरी तरह एक ही चीज़ को प्रत्येक अद्वितीय शिक्षार्थी को बार-बार दोहराया जाना है। यह सामान्य रूप से मूल शिक्षा प्रणाली में नहीं हुआ करता था। साथ ही यह अप्राप्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर जारी दौड़ रूपी मरीचिका जैसी प्रतीत होती है।  

मुझे लगता है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली की वास्तविकता और दुष्प्रभावों को समझने के बाद अब हमें अपने मूल सिद्धांतों पर लौटना चाहिए। मैं पुरानी तकनीकों की वकालत नहीं करता।शिक्षा प्रणाली के मूल और बुनियादी मूल्यों का एक बार फिर से अवलोकन और विवेचन होना चाहिए। यह निश्चित रूप से लोगों को अधिक रोजगारपरक और स्वावलम्बी बनाने में मदद करेगा।



रविवार, 24 मई 2020

राष्ट्र निर्माण



 
लोगों को आशियाँ मिले न मिले, पनाह मिले।
समय - समय पर, साथ और सलाह मिले।
मंजिल तो बहुत दूर है, ऐ रहगुज़र;
दवा का असर और दुआ में बसर होनी चाहिए।
समय है, समय तो कटना ही है,
दूर से आवाज का भी यदि सहारा हो,
आँखों में हों आँसू , गुर्बतों से भले दिल गुब्बारा हो,
बच्चों  की नसल और जीवन की असल जो बची रही,
तो कसम है हिन्द की, फिर उठ खड़े होंगे,
हम चिड़िया नहीं हैं, बाज हैं; मुसीबतों के सरताज हैं।  
जगह की फितरत है ऐसी,
बादशाहत छोड़ कूबत पाते देखा है महावीर औ बुद्ध को,
बाप की शहादत के बाद,
कंकरों से साम्राज्य का परचम बनाते देखा सिंह को, गुप्त को,
ह्रदय में हुलसती है बपौती, 
और थाती है ननिहाल की,
प्रताप हूँ, प्रताप रहूँगा;  क्या मजाल संताप की।
जय हो, जय हो, जय हो राष्ट्र निर्माण की,
जय हो, जय हो, जय हो तरकश के इस बाण की। 


शनिवार, 16 मई 2020

जीने का हक़


मजदूर हूँ मैं , हाँ - हाँ मजदूर हूँ मैं,
किस्मत के आगे मजबूर हूँ मैं,
धर्म और सियासत से दूर हूँ मैं,
मजदूर हूँ मैं, हाँ - हाँ मजदूर हूँ मैं,

जेठ की तपती दोपहरी का श्रम भरपूर हूँ मैं,
पूस की सर्दी का अधजला घूर हूँ मैं,
रोटी के टुकड़े से बच्चों की आँखों में उठता नूर हूँ मैं,
जीवन रक्षण को मासूमों को मीलों चलता क्रूर हूँ मैं ,
मजदूर हूँ मैं, हाँ - हाँ मजदूर हूँ मैं,

हमें समेट सकें ऐसी राहें और मंजिलें कहाँ ?
आंसुओं के कोरों में बांध रखे हैं, हमने अरमां,
मानो न मानो, एक गुलिस्ता हमारा भी है,
पाया न हो गम नहीं, जीने का हक़ हमारा भी है।
                                                           - सुधेन्दु त्रिपाठी 'गंगेय'

















शुक्रवार, 15 मई 2020

रोज़गार की दौड़

बार-बार मेरे दिमाग में यह बात आती है कि मैं इस दौड़ में क्यों हूं? मैं कभी भी इस में नहीं आना चाहता था। फिर भी हर सुबह मैं उठता हूं और मैं अपने आप को लगभग समान गति के साथ दौड़ता हुआ देखता हूं। कुछ नहीं बदला। मैं अपने पूरे जोश के साथ दिन की शुरुआत करता हूं तब भी मैं आधी रात या देर शाम तक उसी दुःख और दुःख की अनुभूति के साथ आता हूं। मेरे प्यारे दोस्तों यह केवल मेरी कहानी नहीं है। यह उन 70 करोड़ भारतीयों की कहानी है जो लॉर्ड थॉमस बबिंगटन मैकाले के समय से अंग्रेजी / ईस्ट इंडिया कंपनी शिक्षा प्रणाली के अवशेषों को ढ़ो रहे हैं। और सबसे दुखदायी स्थिति, कि हम इस मलबे का हिस्सा होने पर गर्व महसूस करते हैं।



हम यह अच्छी तरह से जानते हैं कि विभिन्न पूर्वाग्रहों और अनुमानों के प्रभाव कितने गहरे होते हैं। अगर सब एक साथ लिखा जाए तो यह हेलो इफेक्ट, स्टीरियो टाइपिंग आदि से होते हुए पूरी एक श्रृंखला हो जाएगी। विश्वास प्रणाली एक प्रकार का नियंत्रण या तंत्र है जो हमारे सुपर जिन्न (उप-चेतन मन) को संभाल / प्रभावित कर सकता है। पूर्व भारतीय शिक्षा प्रणाली की यह रणनीति हमारी व्यवस्थाओं से ही नहीं बल्कि हमारे स्वयं से हमारे विश्वास को खत्म करने / कमजोर करने की थी। और बार-बार ऐसा ही हुआ। प्रतिमान बदलाव की पद्धति का उपयोग कर के भारतीयों के मन को इस सम्मोहित किया गया कि भारत से दुनियाँ में प्रचलित होने वाली सर्वोत्तम प्रथाएं भी बेकार लगने लगीं। सम्मान, अनादर में बदल गया था।


यद्यपि इस शिक्षा प्रणाली ने बड़ी संख्या में क्लर्कों / अनुयायियों का उत्पादन किया, जिन्हें नौकरियों,भौतिक संसाधनों, सुविधाओं आदि के संदर्भ में प्रारंभिक लाभ मिला; लेकिन लंबे समय तक यह पीढ़ी दर पीढ़ी पश्चिमी विचार प्रक्रिया की ओर पीढ़ियों के प्रवास को बढ़ावा देता रहा और भारतीय विचार पद्धति को नुकसान पहुंचाता रहा। लोगों को कई बार आश्चर्य होताहै कि 60-70 साल में इतना बड़ा ब्रेन ड्रेन कैसे हुआ? लेकिन मेरा मानना ​​है कि यह 200 साल पहले शुरू हुआ था ईस्ट इंडिया कंपनी शिक्षा प्रणाली की नीव को सभी रणनीतियों को ध्यान में रखते हुए रखा गया था।


कोविद -19 हमें एक ऐसे मोड़ पर ले आया है जहाँ हम बैठकर विश्लेषण कर सकते हैं और चुन सकते हैं। पिछले 2 महीनों में हम लगभग 25% संचार, 50% संसाधनों और 35% गतिविधियों के साथ अपना जीवन जीने में सक्षम रहे हैं। भौतिकवादी संसाधनों के बिना भी हम अपने जीवन को बनाए रखने में सक्षम हैं और वह भी निकट और प्रिय लोगों के बहुत करीब। जीवन के ऐसे कठिन लेकिन महत्वपूर्ण  सबक को सिखाने के लिए भगवान को कोटिशः साधुवाद देते हैं।





विशिष्ट पोस्ट

जीने का हक़

मजदूर हूँ मैं , हाँ - हाँ मजदूर हूँ मैं, किस्मत के आगे मजबूर हूँ मैं, धर्म और सियासत से दूर हूँ मैं, मजदूर हूँ मैं, हाँ - हाँ...