शनिवार, 16 मई 2020

जीने का हक़


मजदूर हूँ मैं , हाँ - हाँ मजदूर हूँ मैं,
किस्मत के आगे मजबूर हूँ मैं,
धर्म और सियासत से दूर हूँ मैं,
मजदूर हूँ मैं, हाँ - हाँ मजदूर हूँ मैं,

जेठ की तपती दोपहरी का श्रम भरपूर हूँ मैं,
पूस की सर्दी का अधजला घूर हूँ मैं,
रोटी के टुकड़े से बच्चों की आँखों में उठता नूर हूँ मैं,
जीवन रक्षण को मासूमों को मीलों चलता क्रूर हूँ मैं ,
मजदूर हूँ मैं, हाँ - हाँ मजदूर हूँ मैं,

हमें समेट सकें ऐसी राहें और मंजिलें कहाँ ?
आंसुओं के कोरों में बांध रखे हैं, हमने अरमां,
मानो न मानो, एक गुलिस्ता हमारा भी है,
पाया न हो गम नहीं, जीने का हक़ हमारा भी है।
                                                           - सुधेन्दु त्रिपाठी 'गंगेय'

















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