याद आते हैं वे दिन जब हिंदुस्तान नया - नया आज़ाद हुआ था। मित्रों यह याद मेरी स्वयं की नहीं बाप-दादाओं की समेटी हुई थाती है जो आज भी मैं अपने सीने से लगाए घूमा करता हूँ। संसाधनों के नाम पर गिनी - चुनी चीजें हुआ करती थीं। "संघे शक्तिः कल युगे" के तौर पर सब मिल जुल कर "साथी हाथ बढ़ाना" का गीत गा रहे थे और समाज कल्याण में जीवन न्यौछावर करते जा रहे थे।
जिसके जो अभिरुचि थी वह उस चीज में अपना योगदान देने की कोशिश कर रहा था। जहाँ बड़े बड़े धन कुबेरों ने अपनी तिजोरियां खोल दी थीं। जिनके पास वह साधन सम्पन्नता नहीं थी वे भी अपने मनोरथ के बल पर और सुनियोजन शक्ति के बल पर जन - कल्याण में पीछे नहीं थे। जहाँ बजाज, खेतान, टाटा, लाल भाई आदि जैसे धनाढ़्य उद्योग धंधो का बीजारोपण कर रहे थे वहीँ सरकार विभिन्न रियासतों की मदद से और उपलब्ध सरकारी कोष से शिक्षा और स्वस्थ्य की मूल भूत सुविधाओं को जुटाने का प्रयास कर रही थी। पंडित मदन मोहन मालवीय, सर सैयद अहमद और ऐसे कई अन्य नाम थे जो पूंजी पति तो नहीं थे किन्तु कुछ अच्छा करने की उत्कट भावना ने उन्हें पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप और इक्विटी फंडिंग का अधिष्ठाता बनवाया और शिक्षा में एक मिसाल कायम कराई।
ऐसा नहीं है की समान्य जनता का इसमें कोई योगदान नहीं था। सबसे बड़ा योगदान जन - सामान्य का ही था। जिस संतोष, संयम, निष्ठा , विश्वास और कर्तव्य परायणता की माटी से वे रचे थे उसी ने भारत के इस सुदृढ़ अवतार की नींव रखी। उनकी बचाई एक -एक पाई, आज एक एक करोड़ के बराबर हो गयी है। उनके द्वारा सींचे संस्कार ने हमको सपूत बनाये रखा और प्रगतिशील विचारधारा का वाहक बनाया जो अपने आप में अद्वितीय है। कहाँ हम हर चीज के लिए मोहताज़ और निर्भर थे और कहाँ आज स्वनिर्भर तो हैं ही, साथ ही दूसरों की मदद करने में सक्षम भी हैं।
कहते हैं अंग्रेजों ने पूरे २०० वर्षों तक भारत के संसाधनों का दोहन किया था। और जब परिस्थितयां विपरीत होने लगीं तो बगला भगत बनकर स्वतंत्रता की बाग़ डोर कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के हाथों में सौंप कर चले गए। वास्तविक तौर पर यह कहानी दो बिल्लियों और बन्दर वाली थी। वह दोनों बिल्लियां भारत और पाकिस्तान के रूप में आज भी लड़ा करती हैं।
वैसे भी कहा गया है - "होइहै उहइ जो राम रची राखा , को करि तरक बढ़ावहि शाखा।"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें