भारतीय जीवन पद्धति में नव रस , नव निधि, अष्ट
सिद्धियों की बात कही गयी है। इन सभी में कहीं न कहीं भक्ति और संगीत का
जिक्र है। संगीत को वैसे ही मनमोहक माना जाता रहा है और यह प्रकृति के सुरम्य उपहारों
में से एक है। यदि ध्यान दिया जाए तो पाएंगे कि देवताओं का एक नाम सुर है, इसे इस
तरह से भी देखा जा सकता है कि शब्दों की कर्णप्रियता, मनमोहकता, छंद और व्याकरण भाषा की अलौकिकता की पराकाष्ठा के उस प्रतिमान तक पहुंचाते हैं कि
साधन और साध्य का भेद ही मिट जाता है। वहीँ दूसरी ओर कर्कशता, लयहीनता, व्याकरण
जनित त्रुटि संस्कारहीनता का परचायक तो है ही, साथ ही साथ उसकी पराकाष्ठा आसुरी
प्रवृत्तिओं का द्योतक भी है।
ऐसा कहा जाता है की माहेश्वर सूत्र का
प्रतिपादन स्वयं भगवन शिव ने किया था। इसी प्रकार अधिकतर देवी देवताओं को किसी न
किसी कला से जोड़ा जाता रहा है जो उनकी संवेदनशीलता , सौम्यता एवं मानवीय पक्षों का
परिचायक है। कृष्ण भगवान् को बंसी और नृत्य से जोड़कर देखा जाता रहा है तो शिव को
डमरू बजाने से। दोनों के नाम नटवर और नटराज भी हैं। इसी प्रकार माता
सरस्वती , महर्षी नारद , कपिवर श्री हनुमान जी को वीणा की साधना करते बताया
जाता है। ऐसे ही रावण को भी वीणा का बहुत ही उत्तम ज्ञान था और उसके वीणा
वादन से शिवजी प्रसन्न हुए थे।
भक्ति का और संगीत का नाता बड़ा ही पुराना है। और ऐसा भी नहीं है की यह नाता केवल सनातन धर्म में है। यह एक
सामान्य मान्यता है और अनुभवों से यह सिद्ध भी हुआ है कि ईश्वर की
भक्ति और उसके समर्पण में की गई चीजें हमेशा पारलौकिक हो जाती हैं। हाँ यह
बात और है की यह जादू समर्पण , निष्ठा, इन सब की सम्मिलित दृढ़ता का भी
हो सकता है। इसी लिए सभी धर्मों में भक्ति की भाषा काव्य, भजन , संगीत आदि
है।
भारतीय सिनेमा जगत, चाहे वह छोटा पर्दा हो या
बड़ा दोनों से संगीत का बड़ा पुराना नाता रहा है। भक्ति संगीत भी इससे इतर नहीं
है। भारतीय सिनेमा में भक्ति की धारा, सिनेमा की शुरुआत से ही बहती रही है और
इसके बहाव में नैरंतर्य आज भी विद्यमान है। संगीतकारों के प्रयासों और
प्रतिभा वैविध्य ने भक्ति संगीत को एक अलग विधा के रूप में भी स्थापित किया। भक्ति
संगीत के कुछ जाने मने नाम हैं लता मंगेशकर , रविंद्र जैन , महेंद्र कपूर , गुलशन
कुमार , अनुराधा पौडवाल , अनूप जलोटा, मोहम्मद रफ़ी , पंडित जसराज, उदित नारायण
आदि। इनमे से रविंद्र जैन और महेंद्र कपूर का नाम विशेष विस्मर्णीय है।
‘रामायण’, ‘श्रीकृष्णा’, ‘लवकुश’, ‘जय माँ
दुर्गा’, ‘साई बाबा’ जैसे मशहूर धारावाहिकों में रवींद्र जैन ने अपने संगीत
से प्राण फूंक दिए थे। एक ऐसा भी समय आया जब वे भक्ति संगीत का पर्याय हो चले।
यहाँ तक कि कुछ लोग तो उन्हें उनकी कृष्ण भक्ति के कारण आधुनिक काल का सूरदास भी
कहने लगे। उनके कुछ प्रसिद्द गीत हैं - (गीत गाता चल-1975), ले जाएंगे, ले जाएंगे, दिलवाले
दुल्हनिया ले जाएंगे (चोर मचाए शोर-1973), एक राधा एक मीरा (राम तेरी गंगा मैली-1985),
अंखियों के झरोखों से, मैंने जो देखा सांवरे (अंखियों के झरोखों से-1978), श्याम तेरी
बंसी पुकारे राधा नाम (गीत गाता चल-1975) आदि। सन् १९८५ में उन्हें फ़िल्म राम
तेरी गंगा मैली के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार प्रदान किया
गया। वर्ष २०१५ में उनको पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
महेन्द्र कपूर हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध पार्श्वगायक थे। उन्होंने बी
आर चोपड़ा की फिल्मों हमराज़, ग़ुमराह, धूल का फूल, वक़्त, धुंध में विशेष रूप से यादगार
गाने गाए। संगीतकार रवि ने इनमें से अधिकाश फ़िल्मों में संगीत दिया। बदल जाए अगर
माली, चमन होता नही खाली, चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाए हम दोनो, हैं प्रीत जहा की रीत सदा, मैं
गीत वहा के गाता हू, मेरे देश की धरती सोन उगले, उगले हिरे मोती, ना मुँह छुपा के
जियो और ना सर झुका के जियो, नील गगन के तले, धरती का प्यार पले आदि उनके
कुछ सु प्रसिद्द गाने हैं। महेंद्र कपूर ने वैसे तो सैकड़ों भजन गाये हैं पर बी
आर चोपड़ा के धारावाहिक महाभारत का टाइटल गीत गा कर उन्होंने अपनी छवि को और
पुख्ता किया। 1963 - चलो इक बार फ़िर से (ग़ुमराह), 1967 - नीले गगन के तले (हमराज़),
1974 - नहीं नहीं (रोटी कपड़ा और मकान) के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से
सम्मानित किया गया।
भक्ति संगीत में इन दोनों दिग्गजों का योगदान
विस्मर्णीय है।
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